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सुरों के साधक असमिया लोक वाद्य यंत्रों के संरक्षक माधव कृष्ण दास — पटना ।

अब बिहार की लोकधुनों को भी दे रहे नया जीवन

रवि रंजन ।

ब्रह्मपुत्र की लहरों से उठती बरगीत की दिव्य धुन, चाय बागानों की सरसराहट में रंगाली का राग, और पहाड़ियों में गूंजता पेपा—असम की आत्मा इन्हीं सुरों में बसती है। जब पश्चिमी संगीत की आधुनिक लहरें पारंपरिक लोकधुनों को निगलने लगीं, तब एक साधक ने इसे बचाने की ठानी—माधव कृष्ण दास।

संगीत-साधना की विरासत

डिब्रूगढ़ निवासी माधव कृष्ण दास का जन्म एक सांगीतिक परिवार में हुआ। माता जी डॉ. डॉली दास, स्वयं शास्त्रीय संगीत विशारद हैं और 2017 में बुल्गारिया में वर्ल्ड गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया है।

संगीत की यह परंपरा माधव ने बचपन में ही आत्मसात कर ली। मात्र सातवीं कक्षा में उन्होंने डिब्रूगढ़ संगीत महाविद्यालय से “संगीत विशारद” की डिग्री प्राप्त की—यह उपलब्धि इतनी कम उम्र में प्राप्त करने वाले वे पहले छात्र बने।

22 से अधिक वाद्य यंत्रों पर महारत

माधव दास आज पेपा, बांसुरी, ढोल, खोल, ताल, गगना, नगाड़ा, डोटारा, तुकारी, एकतारा, सेरजा सहित 22 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बख़ूबी बजा सकते हैं। उन्होंने स्वयं ‘माधव बांसुरी’ नामक आधुनिक स्केल पर आधारित बांसुरी सेट का आविष्कार भी किया है।

2009 में श्रीमंत शंकरदेव पर आधारित फीचर फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में उन्होंने अकेले 22 वाद्य यंत्रों का प्रयोग कर रिकॉर्ड कायम किया।

लोकसंगीत को पाठ्यक्रम में शामिल कराया

असम के पारंपरिक गीतों और रागों को संरक्षित करने हेतु उन्होंने एक विशेष सिलेबस तैयार किया जिसे सर्वभारतीय संगीत ओ संस्कृति परिषद, कोलकाता द्वारा मान्यता प्राप्त हुई। अब यह कई संगीत संस्थानों में पढ़ाया जाता है।

वाद्य यंत्रों का पुनरुद्धार

माधव कृष्ण दास ने असम की जनजातीय व लोक परंपराओं से जुड़े लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों को इकट्ठा कर न सिर्फ़ उन्हें पुनर्जीवित किया बल्कि खुद उनके निर्माण की भी पहल की ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे जुड़ सकें।

बिहार से विशेष लगाव

वर्तमान में वे कैमरामैन ग्रेड – l के पद पर डीडी बिहार , दूरदर्शन केंद्र, पटना में कार्यरत हैं। उनकी पहली पोस्टिंग मुजफ्फरपुर और फिर पटना रही।
बिहार में भी वे गाँव-गाँव जाकर लोक गीतों, धुनों और वाद्य यंत्रों का संग्रह कर रहे हैं। उन्होंने कई पुराने लोक वाद्य यंत्रों को पुनर्स्थापित कर, बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को नया जीवन देने की दिशा में अनोखी पहल शुरू की है।

सम्मान और उपलब्धियाँ

महानायक महाराज महावीर पृथु सम्मान – 2025
इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दो बार नाम दर्ज
सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड
CCRT छात्रवृत्ति, और
दर्जनों अन्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान

बहुआयामी कलाकार
माधव कृष्ण दास सिर्फ़ संगीतज्ञ ही नहीं, एक प्रतिभाशाली चित्रकार, लेखक और सांस्कृतिक संरक्षक भी हैं। उनकी पत्नी माया सेन दास, गुवाहाटी में कार्यरत हैं और कला व साहित्य से गहराई से जुड़ी हैं। दोनों मिलकर असम की लोक विरासत को किताबों, डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ और अनुवादों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा रहे हैं।

“जब तक मेरे वाद्य यंत्रों से स्वर निकलते रहेंगे…”

श्री दास कहते हैं— “संगीत ही वह स्वर है जो हमें मनुष्य बनाए रखता है। लोकधुनें केवल ध्वनि नहीं, समाज की आत्मा हैं। जब तक मेरे बनाये वाद्य यंत्रों से स्वर गूंजते रहेंगे, तब तक यह संस्कृति जीवित रहेगी।”

ऐसे सुर-साधकों से ही भारत की सांस्कृतिक आत्मा जीवंत रहती है। माधव कृष्ण दास जैसे कलाकार देश के संगीत भविष्य को सहेज रहे हैं—एक-एक सुर के साथ।

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